Monday, 16 March 2015


गौ माँ का ज्ञान पत्रिका (माता-पिता गौधाम बनूड़ ) में प्रकाशित हुआ 
गौ - सेवा की महिमा
                                                                                          आर एम मित्तल 
                                                                                                          रिटायर्ड चीफ मैनेजर
                                                                                                          पंजाब नैशनल बैंक                                  

धर्म ग्रंथों में लिखा है की गौओं के शरीर को खुजलाने से या उनके शरीर के कीटाणुओं को दूर करने से मनुष्य अपने समस्त पापों को धो डालता है। गौओं को गोग्रास दान करने से महान पुण्यों की प्राप्ति हो ती है। गौओं को चराकर उन्हें जलाशय तक घुमाकर जल पिलाने से मनुष्य अन्नत वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है।
गौओं के प्रचारण के लिए गोचरभूमि की व्यवस्था कर मनुष्य निःसंदेह अश्वमेघ यज्ञ का पहल प्राप्त करता है। गौओं के लिए गोशाला का निर्माण कर मनुष्य पूरे नगर का स्वामी बन जाता है और उन्हें नमक खिलाने से मनुष्य को महान सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
गौसेवा की महिमा
गौओं को भय से मुक्त कर देने पर मनुष्य स्वयं भी भय से मुक्त हो जाता है। कसाई के हाथ से गौ को खरीद लेने पर गोमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
गौओं की सर्दी तथा धुप से रक्षा करने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती है। गौओं के उठने पर उठ जाएं और बैठने पर बैठ जाएं। गौओं के भोजन कर लेने पर भोजन करें और जल पी लेने पर स्वयं भी जल पिएँ। एक माह तक ऐसा करने वाले गोव्रती के सम्पूर्ण पाप सर्वथा नष्ट हो जाते हैं।
अपने सामर्थ्य अनुसार तीन या सात दिन तक जौ आदि से गौओं के भोजन आदि की व्यवस्था करने से मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है और उसे महान पुण्य की प्राप्ति होती है।
गाय के खुर से उतपन्न धूलि समस्त पापों को नष्ट करने वाली मंगलकारिणी,पवित्र करने वाली और दुःख दरिद्रता को नष्ट करने वाली है। गौओं को स्पर्श करना बड़ा पुण्यदायक है और उससे समस्त दुःस्वप्न पाप आदि नष्ट हो जाते हैं।
गाय के गोमय से उपलिप्त स्थान सब प्रकार से पवित्र स्थान कहा गया है। इसलिए यज्ञशाला और भोजन बनाने के स्थान को गोमय से लीपना चाहिए।
यज्ञ को भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है और वह सर्वागत्या गौओं में ही प्रतिष्ठित है इसलिए गौओं को भी प्राचीन आचार्यों ने विष्णु का स्वरूप ही मन है। गौएँ पूजनीय,कीर्तनीय और नमस्करणीय हैं। उन्हें सदा भोजन देना चाहिए और उनकी सेवा करनी चाहिए। गायों की सेवा से मनुष्य निर्मल और दुःख तथा शोकरहित श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त करता है। इसलिए धर्मपरायण मनुष्यों को प्रयत्नपूर्वक गायों की सेवा अवश्य करनी चाहिए
आर एम मित्तल

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